स्वार्थ

हवा हो चुके वे दिन
लड़ता था जब मैं
अन्याय अत्याचार से
खौल उठता था खून जब
देखते ही काम कोई
नियम विरुद्ध.
काँपता है खून अब तो
शामिल देख खुद को
नियम विरुद्ध काम में.
सोचता अभी भी हूँ
मसीहा तो मैं था नहीं
गलतियाँ जो करता पर
वे भी इतनी बड़ी नहीं
बन पाना इंसान क्या फिर
इतना कठिन होता है?
बात जैसे कल की है
सिलेंडर की लाइन में
मच गई थी भगदड़ सी
पता चला अचानक जब
वितरण हो रहा थोड़ी दूर पर
लगे थे जो लाइन में सुबह से
भगदड़ में पीछे वे रह गए
मैं लेकिन पीछे से
आगे पहुँच गया.
जानता था गलत है यह
जुटा लेकिन पाया नहीं साहस
स्वेच्छा से पीछे चले जाने का.

बस में तो अक्सर ही
मचती है छीना झपटी सीट की
अपनी जवानी का
उठाता हूँ फायदा
सीट लपक लेता हूँ
खड़े ही रह जाते हैं
बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग जब
चाहता हूँ उठना तब
शर्म लेकिन उठने नहीं देती है
समझ न लें लोग मुझे बेवकूफ.
(मौका छोड़ देने को
समझते हैं लोग यही
मेरे जमाने के.)

ऐसे ही छोटे-मोटे स्वार्थ कई
ऊपर मुझे उठने नहीं देते हैं
लड़ने नहीं देते, अन्याय-अत्याचार से
मनोबल हर लेते हैं.

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