सृजन

मंत्रमुग्ध हो जाता था
देख कर कलाकृति
सुन कर संगीत कोई शांतस्निग्ध.
भाव-विभोर कर देती थीं
कविता-कहानियाँ
और हो जाता था व्याकुल
वैसा ही लिखने को
रचने को पेंटिंग
बाँसुरी बजाने को.
भटकता रहा ऐसे ही
लेकर अपूर्णता
कुछ भी न पाया साध.
एक दिन अचानक जब
ऋचाएँ ऋग्वैदिक सुनीं
सारी समस्या हल हो गई
पदचिह्न कोई अपना
छोड़ा न था सृष्टा ने
रह कर अनाम ही
रची थीं ऋचाएँ
अद्वितीय अनुपम
ऋग्वैदिक ऋषियों ने.

देखता हूँ अब तो जब
कोई मनोहारी कृति
कविता-कहानी या पेंटिंग
लगता यह मेरी है
मैं ही सृष्टा इसका
पाता असीम सुख
दुनिया की प्रत्येक
अनुपम रचना का.
दिलचस्प तो यह है कि
रचता अब जो कुछ भी
बनता वह अद्वितीय
खो जाता रचना में
हो जाता एकाकार.
रहता हूँ लेकिन नेपथ्य में
देता नहीं नाम अपना
चाहता हूँ दूर रहे
रचना मेरे अहं से
पढ़े-सुने जो भी उन्हें
लगे उसे अपनी सी
तभी अमर होंगी वे
वैदिक ऋचाओं सी
होकर विलग सृष्टा से.

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