रोटी, कपड़ा, मकान
ऐसा तो सोचा न था
बनने के बाद घर
जीवन हो जाएगा
इतना नीरस.
सुविधाएँ जुट गईं
बन गया अध्ययन कक्ष
मूर्ति लेकिन बेजान रह गई
कर न पाया, प्राण-प्रतिष्ठा.
शव जैसा ढोता हूँ फिरता
अपना ही तन-मन.
हैरान सोचता
चूक कहाँ हो गई?
छूट गए संगी-साथी
बन गया मकान मालिक
शामिल खुशहालों में हो गया.
हासिल करना लेकिन
बुनियादी सुविधाएँ
रोटी, कपड़ा, मकान
क्या यह गलत था?
गलती तो की नहीं कुछ
कानूनी नजरों में
फिर क्यों सताता अपराध बोध?
अपराधी दिखता हूँ
अपनी ही नजरों में!
होता महसूस यह
बेघर करोड़ों हों
लोग जिस देश में
हासिल कर लेना छत
निश्चय ही गलत था
फैली महामारी सी हो
जहाँ बेरोजगारी
पा लेना नौकरी
बेशक अपराध था.
इसीलिये लगता हूँ अपराधी
अपनी ही नजरों में
महसूस करता अपराध बोध
हासिल कर रोटी, कपड़ा, मकान
दूर हो गया हूँ अपने साथियों से
करोड़ों देशवासियों से.
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