कविता की आत्मा

क्या विषय चुक गए हैं?
सोचने की जरूरत तो कभी पड़ती न थी!
हाथ उठाते ही चल पड़ती थी लेखनी.
तो क्या खत्म हो गए हैं-
सारे अन्याय, अत्याचार, अनाचार!
अगर नहीं, तो कहाँ पैदा हो गया अवरोध?
सोचना बुरी बात नहीं
विषयाधिक्य हो तब भी
पड़ता ही है सोचना
कि संयमित रहे पानी
तोड़ कर कूल-किनारे
इसे ज़ाया न कर दे नदी.
पर ढूँढ़ना पड़े अगर पानी
तो मुँह छिपाने कहाँ जाए नदी!
तो क्या कट गया हूँ जड़ों से?
लिखता था जिन शोषकों के खिलाफ
देकर मान-पुरस्कार
खरीद लिया उन्होंने मुझे!
सोचो, कवि सोचो-
पर कविता के नहीं,
अपना जमीर बचाने के विषय में.
कविता का क्या है
वह तो कैेसे भी बन जाएगी
पर बिक गए अगर तुम
तो उसकी आत्मा मर जाएगी.

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