बादलों की नींद टूटी

मौसम तो बीत चुका है बारिश का
फिर भी छाये हैं बादल
सर्दियों के महीने में
ऐसा होना तो नहीं था
फिर भी मनोहारी है मौसम
शायद हमारी तरह बादलों की भी
देर से खुली हो नींद
और अब भरपाई के लिये
चाहते हों वे बरस जाना.
बैठ जाती है लेकिन
छाती किसान की
बुलाया तो उसी ने था
पूजा-पाठ कर मेघों को
लेकिन शहरी हो गये हैं शायद वरुणदेव
अनियमित हो गई है उनकी भी दिनचर्या
और नींद खुलते ही दौड़े आए.
लेकिन अब लौटाने को उनको
फिर से पूजा-पाठ में जुटे हैं किसान
वरना रबी फसल भी होगी बर्बाद
चना-मटर के अँखुओं पर
लग जायेंगे माहू.

खुश हैं उधर
शहर के बाशिंदे
पिकनिक का मूड
बना दिया है बादलों ने
सर्दी की ठिठुरन से
मिला है छुटकारा
सोच रहे हैं वे आफिस से
छुट्टी मारने का बहाना
पत्नी से कह रहे
जल्दी बनाने को खाना.
सुलगती है सिगड़ी
और मिलता है सुकून
कोयले के धुएँ की गंध बिना
उन्हें अजीब सा लगता है दिन.

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