लय

होता है दिनचर्या में जब

कोई व्यतिक्रम
और टूटती है जीवन की लय
व्याकुल हो जाता हूँ
चाहता हूँ यह किसी भी तरह मिले
और जब मिलती है
तो खुश होता हूँ इस तरह
मानो अनमोल निधि मिली हो.
चाहता हूँ दूसरों को बताना
कि वे भी जानें कैसा होता है
लय पाने का सुख.
पर खाई इतनी गहरी है
कि पहुँचने तक उनके
उलट जाते हैं अर्थ
मैं कहना चाहता हूँ ‘ब्रह्मचर्य’
और वे समझ लेते हैं ‘नपुंसक’
इस तरह खड़ी हो जाती है
सम्प्रेषण की समस्या.
इसलिये नहीं करता कोशिश
उन्हें अब समझाने की
सिर्फ तलाशता हूँ मौके
कि दिखा सकूँ करके.
जैसे उस दिन जब कह रहे थे वे
काश! लग जाती लाटरी
मैंने कुछ नहीं दिया जवाब
किंतु अगली बार जब
रास्ते में पड़ा दिखा
पचास का लावारिस नोट
मैंने उठाया
और फिर उसी जगह छोड़ दिया
जहाँ गिरा था वह
कि शायद समझ सकें वे
बिना मेहनत का धन
माटी समान होता है.
अगली बार जब मैं गुजरूँगा उस रास्ते से
और सीख चुके होंगे वे सबक
नहीं उठाऊँगा मैं नोट.
लेकिन फिलहाल तो मुझे बार-बार
वह नोट उठाना है और छोड़ना है
अपनी लय को तोड़ना है.
जैसे सिखाता है कोई
बच्चों को चलना.

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