रेगिस्तान

डूबता हूँ संगीत में
और अचानक आने लगती है
कर्कश ध्वनि
गाते हुए मधुर तान
हो गया हो गायक जैसे बेसुरा.
लिखते-पढ़ते अनायास
लगने लगता है सब बेतुका
दिल को छू पाती नहीं कविताएँ
समझ नहीं आते हैं तैलचित्र
सिर के ऊपर से
गुजर जाता माडर्न आर्ट
अजनबी सा दीखता है समय अपना.
डर तो कभी लगा नहीं
चलने में एकाकी
पूरा विश्वास था
चलता था जिस पथ पर.
पहुँचा उसी के बल पर
बीच रेगिस्तान में.
दहशत सी हो रही है लेकिन अब
जीवन रस सूखता सा जा रहा
संस्कृति में घुल कर अपने समय की
धीरे-धीरे रेत होता जा रहा.
दीखता किनारा नहीं
नजर जाती जहाँ भी
फैली है रेत दूर-दूर तक
लग रहा पथराया सा
अपना शरीर भी.
चीरती है मन को जो कर्कश ध्वनि
चिड़चिड़ापन बढ़ता ही जा रहा
होता महसूस जैसे
मौत के आगोश में
डूबता ही जा रहा...

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