संतुलन

भभक रही है बाती
बेतहाशा काम कर रहा इन दिनों
डालता हूँ हाथ जिस भी काम में
बेशुमार आतीं नजर खामियाँ
फुर्सत न मिलती क्षण भर को भी.
बोझ बढ़ता जा रहा शरीर पर
तेजी से छीजता यह जा रहा
कैसे विश्राम इसको दूँ लेकिन
करने को काम इतना सारा है
पड़ जाये कम पूरा जीवन भी.

होना तो चाहिये न था ऐसा
समय तो प्रकृति कम देती नहीं
गँवा दिया निरर्थक बहुतों ने पर
दुरुपयोग भी कम किया नहीं.

इसीलिये कम पड़ गया यह
करनी होगी क्षतिपूर्ति किसी तरह
कपड़ों से लदे-फँदे सम्राट का
प्रायश्चित करना होगा
गांधी को नंगा रह.
संतुलन बनाने का
बस यही तरीका है.

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