रेगिस्तान की यात्रा
खुश था इन दिनों
अच्छी बन रही थीं कविताएँ
सार्थक बीत रहे थे दिन
कड़कड़ाती ठण्ड में भी
उठ आता था भोर में
नियत समय पर.
मजा आने लगा था
परेशानियों को झेलने में
आसान हो गई थी जिंदगी
दु:ख के आवरण में छिपा
मिलने लगा था सुख.
पर वह अंत नहीं था जीवन का
अब जाना, कि रास्ते में मोड़ भी हैं
सूखने लगा है जीवन रस
और बिना पानी के
पार करना है रेगिस्तान.
ऐसा नहीं कि असम्भव है यह
इस रास्ते पर भी
मिल ही जाते हैं कुछ पदचिह्न
पर ढल गए हैं जिस रूप में वे
मंजूर नहीं वह बनना मुझे.
जानता हूँ कि हमेशा से-
ऐसा नहीं रहा होगा कैक्टस
कि रेगिस्तान की यात्रा में
बचाए रखने को जीवनरस
परिस्थितियों ने उसे
बना दिया होगा काँटेदार.
इसी तरह अन्य जीव-जंतुओं ने भी
बाहर से ओढ़ ली होगी कठोरता
ताकि भीतर बचा रह सके
जीने लायक पानी.
पर मैं नहीं बनना चाहता काँटेदार
परिस्थितियों में ढल कर
नहीं चाहता खुद को बचाना
इसीलिए रेगिस्तान में खोद रहा हूँ कुआँ.
जानता हूँ कि रास्ता लम्बा है
और नहीं मिला अगर पानी
तो मौत निश्चित है
पर यह भी मालूम है
कि दम टूटने के पहले
लग सका अगर कुएँ में पानी
तो होगी वह
रेगिस्तान के खत्म होने की शुरुआत
कि गुजरेगी जब अगली पीढ़ी
इस रास्ते से
नहीं बनना पड़ेगा उसे काँटेदार
क्योंकि जब लगेगी उसे प्यास
मिल जायेगा कुआँ.
हो सकता है वे
पानी का कर्ज चुकाने
वृक्ष भी लगाएँ
और यह रेगिस्तान
बनने लगेगा धीरे-धीरे
हरा-भरा उपवन.
यही सपना सँजोये
खोद रहा कुआँ
सूखता जा रहा जीवन रस
पर मुझे पहुँचना ही होगा पानी तक
दम टूटने के पहले
ताकि खत्म हो रेगिस्तान
और बन सकें सब पानीदार.
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