गाँव की शवयात्रा
मैं चिंतित था
दुनिया जहान के प्रति
और अपने प्रति भी.
ट्रेन के इंतजार में
खचाखच भरी भीड़ देख
व्याकुुल हो जाता था यह सोच
कि जो जवान हैं-
घेर लेंगे सारी सीटें
कैसे सफर कर पायेंगी
बच्चों को गोद लिए महिलाएँ!
करता था इरादा
कि नहीं शामिल होऊँगा
सीटों की अंधी दौड़ में
खड़-खड़ करूँगा सफर.
पर सुनाई देते ही ट्रेन के आने की सीटी
अज्ञात आशंका के वशीभूत हो
बदलने लगता था निर्णय
धीमी होते ही ट्रेन
दौड़ पड़ता था सीट पाने
यह सोच कर
कि दिखते ही कोई जरूरतमंद
छोड़ दूँगा जगह.
पर बारी आई जब सीट देने की
पाया मैंने आसपास
अपने ही जैसे जवानों को
वह, जिसे सर्वाधिक जरूरत थी
खचाखच भरी ट्रेन में
मुझ तक पहुँच पाने में असमर्थ थी.
इसी तरह देख कर
समाज में भीषण असमानता
निश्चय किया था कभी
कि नहीं करूँगा नौकरी
पर आया समय जब
परिवार चलाने का
घेर लिया ऐसी ही आशंका ने.
समझाया था अपने मन को
कि मूकदर्शक बनने की अपेक्षा
कर पाऊँगा कुछ मदद
भीषण अभावग्रस्तों की
तो ज्यादा होगा सार्थक.
कभी नहीं कर पाया पर
किसी अभावग्रस्त की मदद
एक हाथ से कमाकर
दूसरे हाथ से चढ़ाता रहा भेंट
शहर की महँगाई को
कभी नहीं उबर पाया
अपनी जरूरतों से
देखते ही रहे राह
गाँव में भाईबंद.
सोचता हूँ कभी-कभी
निर्णय ही गलत था
शायद मैं स्वार्थी था
परीक्षा की घड़ी में
छोड़ा था मैदान
गढ़ लिये थे तर्क.
सबल होते हुए भी
नहीं दौढ़ता सीट को
खड़ा रहता निर्बलों संग
वही मेरा धर्म था.
मदद के बहाने
नहीं जाता शहर
डटा रहता गाँव में
अपने भाई-बंदों संग
यही मेरा फर्ज था.
अनजाने ही हो गया शामिल
शोषकों के पक्ष में
बेच कर प्रतिभा
खरीद लिया जीवन
मर रहे थे गाँव जब
जोड़-जोड़ कर पैसा
खरीद रहा था प्लाट
बनाने की खातिर घर
उजड़ रहे थे गाँव.
आने वाली नस्लें
शायद माफ न कर पायें मुझे
क्योंकि होगी जब पड़ताल
पक्ष और विपक्ष की
तब पायेंगे वे
कि मैं शोषितों में नहीं
शोषकों में था
चंद टुकड़ों के बदले
शहरों ने खरीद ली थी मेरी प्रतिभा
और उसी के बल पर
चूस लिया था खून गाँवों का
अपना जीवन बचाने
मैंने बेच दिया था गाँव
इधर मैं कर रहा था गृहप्रवेश
उधर निकल रही थी गाँव की शवयात्रा.
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