एक पुनर्विचार : सर्वधर्म एकता पर

अच्छा लगता था कभी मुझे
बात करना एकता की
हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की.
किसी को सुनता था घर में रखे
गीता, बाइबिल, कुरान और गुरुग्रंथ
तो श्रद्धा होती थी उस पर.
किंतु सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य से
अब जब मौजूद हैं मेरे नये शहर में
चारों धर्म, अपने दल-बल सहित
मेरे घर के पास ही
मुझे उन्हें झेलना कठिन हो रहा है.
घर में मात्र एक धर्म की मौजूदगी में
पिताजी की घण्टी की आवाज से
मेरे कान भन्ना उठते थे
किंतु यहाँ तो उठता ही रहता है शोर
लाउड स्पीकर से, बारी-बारी से
अल्लाहू अकबर, गुरुग्रंथ साहिब
अथवा रामचरित मानस का.
ढोल की आवाज नजदीक से सुन के
मैं तो घबरा ही उठा हूँ, इस षटराग से
और याद कर रहा हूँ घर की
घण्टी की वह आवाज
जो एक निश्चित समय पर ही
मुझे परेशान करती थी
किंतु यहाँ तो बारी-बारी से मिलकर
सारे धर्म मेरा समूचा समय ही ले लेते हैं
और मैं पुनर्विचार के लिए बाध्य हो गया हूँ
सर्वधर्म एकता पर, एक बार फिर.

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