कुछ भी अतिरिक्त नहीं

कड़ी मशक्कत के बावजूद
कल हो गई जब गलती
अनायास ही आ गई हँसी
जानते हुए भी यह
कि हो सकती है पेशी
मिल सकता है गलती का दण्ड
उदास नहीं हुआ मन
क्योंकि कर चुका था हरसंभव मेहनत
नहीं थी गुंजाइश कोई
करने की इससे ज्यादा
गलती के बावजूद
इसीलिये शांत था मन.

सोचता था पहले हैरान होकर
ऐसा क्यों होता है?
नियम विरुद्ध नहीं क्या यह प्रकृति के!
जानता हूँ पर अब तो
जिम्मेदार हम ही हैं सब कुछ के
मौका मिला जब कामचोरी का
कर न सके स्वेच्छा से काम तब
फिर क्यों गिला-शिकवा हो
मेहनत के बावजूद गलती का?
व्यक्तिगत यह बात नहीं
मानती है प्रकृति हमें एक ही
गुँथे हुए हैं हम सब डोर से
साझा है हवा-पानी
धरती और आसमान
दण्ड भी है साझा इसीलिये
सूली पर चढ़ते ईसामसीह
पीते जहर सुकरात हैं
गोलियों से छलनी होते गांधीजी.

डरता हूँ इसीलिये
मुफ्त की सुख-सुविधा से
होगा भुगतना खामियाजा किसी और को
भुगतते थे शूद्र जैसे
राजों-महाराजों की विलासिता
भुगतती है धरती जैसे
दोहन खनिज संपदाओं का
बदले में हमारी सुख-सुविधा के.

कुछ भी अतिरिक्त नहीं दुनिया में
नियमों के भीतर ही हर कण है
आता जब संकट अकारण ही
झेलता हूँ इसीलिये
किसी के यह दोषों का परिमार्जन है.

Comments

Popular posts from this blog

गूंगे का गुड़

सम्मान

उल्लास उधारी का