दुहराव
चुक जाते हैं सारे भाव
घूमने लगती हैं गोल घेरे में
सारी चीजें
कितना भी बड़ा हो-
आदमी या ग्रह
दुहराव का शिकार होता ही है
जैसे धरती लौट कर आती है
बार-बार उसी जगह
चाहे खुद घूमे
या लगाए सूरज का चक्कर.
सूरज भी कहाँ है मुक्त
दुहराव से
उसे भी तो लगाना होता है चक्कर
अपना सौरमण्डल लेकर
किसी बड़े ग्रह का अपने से.
घूम फिर कर आते हैं वही युग
सृजन के बाद प्रलय, प्रलय के बाद सृजन
कोई भी सम्पूर्ण वस्तु
शायद सीधी रेखा में होती ही नहीं.
फिर मैं क्यों होना चाहता हूँ
दुहराव से मुक्त?
वह तो होगा ही
करना इतना है मुझे
कि बनाना है अपना वृत्त
इतना विशाल
कि सदियाँ लग जायँ
चक्कर पूरा करने में
दुहराव तक पहुँचने में
बीत जाय जिंदगी
और जब करूँ फिर से शुरुआत
तो साथ हो-
अबोध शिशुओं सी निश्छलता
नई शक्ति और नया उल्लास
पहली यात्रा के रूप में
सिर्फ बची हों
सारभूत स्मृतियाँ.
कौन जाने हमारा ब्रह्माण्ड
लगा रहा हो किसी और ब्रह्माण्ड का चक्कर
वह ब्रह्माण्ड भी लगा रहा हो
किसी और का चक्कर
और वह भी किसी और का चक्कर
हम क्यों नहीं बना सकते
अपना वृत्त इतना विशाल
कि ब्रह्माण्ड भी मजबूर हो
लगाने को हमारा चक्कर!
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