सृष्टा

फिर से पहुँच गया हूँ गाँव
जहाँ बिखरे पड़े हैं
मेरी कविता-कहानियों के पात्र.
आसान होता है शहर में बैठ कर
गाँव की बातें लिखना
यहाँ तो कौन सा पात्र
कब आकर झाँकने लगे पीछे से
पता नहीं.
पात्रों को कठपुतली बनाना
मुझे पसंद नहीं
पर यहाँ तो वे इतने सशक्त हैं
कि पसीना छूट जाता है मुझे
उनके बारे में लिखने में
अन्याय या अनदेखी होते ही
रुष्ट हो जाते हैं वे
देखते हैं उलाहने से
एक पर दृष्टि केंद्रित करो
तो दूसरा छूटने लगता है
और दूसरे पर नजर साधो तो तीसरा.
कमी नहीं है यहाँ पात्रों की
वरन मुश्किल होता है चुनाव
जिसे छोड़ो वही नाराज हो जाता है.
कुछ भी करने को तैयार हैं वे
अपने आपको बदलने को भी
शर्त सिर्फ यही है कि न हो अनदेखी
ली जाय दखल.

अब समझ में आता है
कि सृष्टा बनना कितना कठिन होता है.

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