नई दुनिया की ओर

आती है घन की जोरदार आवाज
और धड़क उठता है सीना
जैसे छाती पर चल रहे हों हथौड़े
जाकर देखता हूँ भीतर
बच्चे फोड़ रहे हैं नारियल
मकान मालिक की अनुपस्थिति का
इसी तरह उठाते हैं वे फायदा.
देखता हूँ गौर से तो
नजर आती हैं फर्श पर बारीक दरारें
दिखाता हूँ पत्नी और बच्चों को
पर नहीं होता उन्हें खास दु:ख
क्योंकि घर उनका नहीं-
मकान मालिक का है.
नहीं समझा पाता उन्हें
पर फर्श पर पड़ी हथौड़े की चोट
मेरे दिल पर लगती है
जो कभी भी ले सकती है
हार्टअटैक का रूप
प्रकृति इसी तरह बदला लेती है.

दहेगाँव से पकड़ता हूँ जब
रात की अंतिम बस
कंडक्टर नहीं देता टिकट
न के बराबर होती है चेकिंग की सम्भावना
और पाँच मिनट के सफर में
पाँच रुपए की कमाई का
वह सबसे आसान समय होता है.
माँगता पर मैं जरूर हूँ.
अक्सर वे होते हैं ढीठ
बताते हैं इशारों से
कि रास्ते में हुई अगर चेकिंग
तो सँभाल लेंगे वे.
पर कुछ निकलते हैं संकोची
और माँगने पर मेरे
दे देते हैं टिकट
कट जाता है पर जब
निर्विघ्न सफर
उतरते हुए बस से
देखता हूँ कंडक्टर के चेहरे पर
पाँच रुपए गँवा देने की हताशा
तो लज्जित हो उठता हूँ
आखिर बीस-बाईस सौ रु. की तनख्वाह में
आज किसका हो पाता है गुजर!
महसूस होता है ऐसा
कि ईमानदार बनने के चक्कर में
ठगा जाता हूँ
और बस मालिक द्वारा
किये जा रहे शोषण में
खुद को शामिल पाता हूँ

मेरे घर में रह कर
पढ़ रहा है भतीजा
पत्नी के विरोध के बावजूद
उसे रखा है मैंने
नहीं चाहता भाई-बंधुओं से
अलग-थलग होना
क्योंकि जानता हूँ
कि मेरी आर्थिक समृद्धि
योग्यता की नहीं, सिर्फ मौके की बात है
कि वंचित हैं जो आज
मौका अगर मिले उन्हें
तो कमा सकते हैं मुझसे दुगुना
कि निकाल दे अगर काम से मालिक
तो दो कौड़ी की रह जायेगी मेरी योग्यता.
पर नहीं समझती पत्नी यह बात
मानती है सिर्फ खुद को हकदार
कमाए गए हर पैसे का.
उसे लगता है कि भतीजे का पक्ष लेकर
मैं अन्याय करता हूँ
और भतीजे को लगता है
कि उसे समानता का हक दिलाने
मैं पर्याप्त नहीं लड़ता हूँ.
चाहता हूँ मैं कि पढ़ ले भतीजा
छोटी-मोटी त्रुटियों को नजरंदाज कर
कि न झेलना पड़े उसे मेरे जैसा संघर्ष
पर मेरी छाँव में रह
वह बाहर की धूप महसूस नहीं कर पाता
मौके का सदुपयोग नहीं कर पाता
और मुझे ही झेलना पड़ता है
उसके हिस्से का संघर्ष.

जितना ही होता है
संवेदनाओं का विस्तार
पड़ता जाता हूँ अकेला
छूटती जाती है दुनिया.
मनमोहक हैं मेरे सपने
बसाना चाहता हूँ एक नया विश्व
स्वर्ग से भी सुंदर
पर पाता हूँ उसमें, खुद को अकेला
और लौट आता हूँ इसी दुनिया में
खाते हुए ठोकर
गिरता हूँ बार-बार
उठता हूँ फिर-फिर
करता हूँ कोशिश
सब कुछ बदलने की.

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