सुख-दु:ख
खुशी के क्षणों में
मन हो जाता है स्वच्छंद
नहीं होती ईश्वर की जरूरत.
तभी याद आता है वह
जब टूटता है अपनों पर
दु:ख का पहाड़.
आखिर क्यों नहीं ले पाते हम
सुख की तरह दु:ख की जिम्मेदारी!
क्यों ठहराते हैं ईश्वर को दोषी?
शायद नहीं टिक पाते हमारे पैर
सुख के क्षणों में
बह जाते हैं धारा में
इसीलिये दु:ख में भी
सँभल नहीं पाते.
जड़ों को अगर कर लें गहरा
न बहें सुख के साथ
तो नहीं डिगा पायेगा दु:ख
यह बात और है
कि तब सुख भी नहीं रह पायेगा
सुख जैसा
जैसे दु:ख नहीं रह जायेगा दु:ख
क्या हमें यह स्वीकार है?
पर तब दुनिया भी तो
नहीं रह जायेगी दुनिया जैसी!
कैसा लगेगा जब नहीं गूँजेगी
किलकारी और रुलाई!
क्या हम नाटक की तरह
नहीं खेल सकते
सुख और दु:ख का खेल!
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