नीलकण्ठ

हैरान हूँ
लिखता हूँ कविता
और दूसरे दिन वह हो जाती है सच
जैसे भविष्यवाणी.
नहीं-
कौतूहल का अब समय नहीं रहा
नहीं बताऊँगा लोगों को
वरना लग जाएगी भीड़
सट्टे का नंबर या भविष्यफल
पूछने वालों की.
ताज्जुब तो यह है
कि कभी जिज्ञासा नहीं रही
भविष्य जानने की
फिर क्यों मिल गया यह
अनचाहे वरदान की तरह!
पर कैसा वरदान है यह
कि रातों की नींद
हो जाती है गायब
देखता हूँ जब कोई अनिष्ट
घटने के एक दिन पहले ही!
जो त्रासदी दुनिया झेलेगी कल
भुगतता हूँ मैं आज ही
क्या यही वरदान है?
नहीं चाहता मैं भविष्यद्रष्टा बनना
इसकी बजाय माँगता हूँ शक्ति
कि बदल सकूँ भविष्य
त्रासदी जो आनी है
रोक सकूँ उसे
बाँट सकूँ अमृत
चाहे बनना पड़े नीलकण्ठ.

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