काम चालू है
सब कुछ वैसा ही है
मेरे दफ्तर में रोज की तरह चहल-पहल है
सब अपने-अपने काम में लगे हैं, मैं भी लगा हूँ
आने वाले आ रहे हैं, जाने वाले जा रहे हैं
परंतु मेरे अंदर पता नहीं कैसी
उथल-पुथल मची है
बेचैनी सी हो रही है
कुछ लिखने का मन कर रहा है.
कागज-पेन जेब में ही रखा है
रोज रख कर लाता हूँ
पर दफ्तर के इस शोरगुल में
टाइप मशीन की खटखट में
कुछ सूझता ही नहीं है.
फिर भी आज मन बेचैन है
मैं अपना काम बीच में ही रोक
कागज-पेन निकाल लेता हूँ
किंतु यह क्या, मेरे साहब आ रहे हैं
उन्होंने डिक्टेशन लेने का निर्देश दिया है
और मैं कागज-पेन जेब के हवाले कर
डिक्टेशन लेने में जुट गया हूँ.
अब डिक्टेशन पूरा हो चुका है
साहब चले गए हैं
और मैं कागज में मशीन लगा कर
उसे टाइप कर रहा हूँ.
सब कुछ वैसा ही चल रहा है
सब अपने-अपने काम में लगे हैं
मैं भी लगा हूँ
आने वाले आ रहे हैं
जाने वाले जा रहे हैं
और टाइपिंग मशीन की खटखट चालू है
किंतु मेरे अंदर कुछ मर गया है.
जब वह जीवित था, तब भी मैं खुश नहीं था
बेचैनी सी मन में छाई थी
और अब जब वह मर चुका है
तब भी मैं खुश नहीं हूँ
हताशा सी मन में भर गई है.
पता नहीं क्यों मैं कभी खुश क्यों नहीं होता हूँ!
फिर भी सब कुछ वैसा ही चल रहा है.
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