अजन्मे की मौत

वैसे तो मुझे अपनी सारी कविताएं प्रिय हैं
पर रह गईं जो अजन्मी ही
उनकी टीस से मन व्याकुल हो जाता है।

दरअसल हम मनुष्य सिर्फ संभावनाएं देखते हैं
और जिसका तो जन्म लेने के पहले ही अंत हो गया
किसको पता है कि उसके भीतर
कितनी अद्‌भुत संभावनाएं रही होंगी
जिन्हें मौका ही नहीं मिला साकार होने का!
लेकिन मरने वाले भी शायद दे जाते हैं खाद-पानी
सौंप जाते हैं अपनी जिम्मेदारी आगत को
रखते हुए मन में यह हसरत
कि पूरे हो सकेंगे उनके सपने
और जन्म लेती है जब अगली कविता
तो ऋणी होती है वह उस अजन्मी कविता की!

...सहसा ही कौंधती है मन में बिजली सी
कि कहीं मेरा जन्म लेना भी तो ऋणी नहीं है
अजन्मे बच्चों की मौत का!

रचनाकाल : 10-14 दिसंबर 2025

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