निर्दोष का निर्वासन
राम जब वन को गए, जानते थे कि उन्हें लौट कर एक दिन आना है अयोध्या फिर से चाहे कितने भी कठिन दिन हों, मगर तय हों तो हम उन्हें काट लिया करते हैं जैसे-तैसे किंतु सीता को मिला होगा जब फिर से वनवास जिंदगी कौन सी उम्मीद में काटी होगी? राजमहलों के तो सुख का था उन्हें लोभ नहीं राम के साथ वे स्वेच्छा से गई थीं वन को किंतु जब छोड़ गए वन में अकेला, लक्ष्मण कुछ क्षणों को तो समझ ही में न आया होगा किस तरह बाद में अपने को संभाला होगा! गर्भ में पल रहे बच्चे न अगर होते तो जान अपनी क्या उसी वक्त न दे दी होती? पाप इतना ये भयानक था कि महलों में भी राम संन्यासियों की भांति न रहते होते दु:ख जो सीता ने सहे वन में कहीं उससे अधिक राम ने मन में ही अपने न सहे होते तो कौन भगवान उन्हें कहता कि मानव के भी पद से नीचे, वे निगाहों से गिर गए होते! ठीक ही करते हैं अब मिथिला नगर के वासी बेटियां अपनी अयोध्या में नहीं ब्याहते हैं। रचनाकाल : 26 मई 2026