भयानक समय
क्या ये भयानक समय नहीं है?
पूछता हूँ मैं अपने आप से
अगर ठीकठाक है सब कुछ
तो क्यों कर रहे हैं किसान आत्महत्या?
गाँव छोड़ कर क्यों भाग रहे हैं लोग
शहरों की ओर?
शहरों में भी कहाँ है सब कुछ ठीकठाक
ट्रेन पकड़ने के लिए दौैड़ते-भागते
जब आफिस से निकलता हूँ स्टेशन की ओर
उड़ानपुल के नीचे-
पथराई आँखों, फटे चीथड़ों वाली
औरतों, बच्चों और अधेड़ों को देख
कलेजा मुँह को आता है.
गुजरती है ट्रेन जब, मलिन बस्ती के बीच से
वहाँ का दृश्य भी कुछ अलग नहीं होता
फटती है दुर्गंध से नाक जहाँ
और चाहते हैं हम ट्रेन गुजर जाय जल्द से जल्द
हजारों को गुजारना पड़ता है वहाँ समूचा जीवन.
फिर क्यों लगता है सब कुछ सामान्य?
क्यों नहीं दिखाई देता कहीं असंतोष!
पेट काट कर जोड़े गए पैसों से
खरीद लेते हैं रंगीन टीवी
और देखते रहते हैं बड़े लोगों की बड़ी बातें.
सुनील बाबू, क्या सचमुच सबकुछ बढ़िया है!
अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य भी कुछ अलग नहीं
ढूँढ़ता ही रहता है अमेरिका कोई न कोई शिकार
कभी नहीं खत्म होती उसकी दादागीरी
ड्रोन विमानों की अकल्पनीय ताकत देख
फटी रह जाती हैं हमारी आँखें
और करते हुए उसकी चर्चा, महसूस होता है गर्व
कि कितने बड़े ज्ञानी हैं हम!
नीरस लगती हैं हमें
उसमें मरने वाले निरपराधों की खबरें
लुभाता है ड्रोन बम.
कैसी है यह देशभक्ति
कि लड़ते हैं जो हमारे हक के नाम पर
मारा जाता है उन्हें
कह कर नक्सलवादी
और हम भी मिलाते हैं सरकार के सुर में सुर
कैसा भयानक समय है
कि लड़ते हैं वे जिसके हक में
खड़ा पाते हैं उसी को, दुश्मनों की कतार में!
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