कालूराम
ढलती है शाम जब
जाकर मेरे घर से
काटता है कालू कुट्टी.
दोपहर मैंने देखा था उसे
अपने बच्चे को
पहनाते हुए कपड़ा
और दुलराते हुए.
चलते हुए मेरे साथ
देखा था उसने
तनिक ठहर कर
बगल के घर में बजते बाजे
(पुत्र जन्म की बधाई में).
बहुत मानता है वह मुझे
कि उसके हमजोलियों के
मालिकों की अपेक्षा
मैं बहुत शरीफ हूँ
और उसके खाने-पीने का
पूरा ध्यान रखता हूँ.
मैं जानता हूँ कि वह ईमानदार है
और अगर मैं बुलाऊँ
तो आधी रात आने के लिए भी तैयार है
फिर भी लोग जब उसके मुँह पर
मेरी प्रशंसा करते हैं
मेरी सहृदयता की चर्चा करते हैं
मैं डूब जाता हूँ, शर्म और ग्लानि से
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि ऐसा करके मैं उस पर
कोई अहसान नहीं करता हूँ
बल्कि अपने अपराध बोध को
दूर करने का प्रयत्न करता हूँ.
पर मैं जानता हूँ
कि ऐसा करके भी मैं
कालूराम नहीं बन सकता हूँ
वह मेरे घर काम कर सकता है
पर मैं उसके घर काम नहीं कर सकता हूँ
यही कारण है कि वह
अपमान सह कर भी हँस लेता है
और मैं प्रशंसा सुन कर भी
खुश नहीं हो पाता हूँ.
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