बांसुरी न बज पाए, इस खातिर शातिर शासक बांस ही जला देते हैं !
जब देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, पश्चिम बंगाल में फास्ट फूड चेन ‘वाओ मोमो’ के गोदाम में लगी भीषण आग में लगभग 25 मजदूर खाक हो गए. दो दर्जन से अधिक जिंदगियों की कीमत इतनी कम तो नहीं होनी चाहिए थी कि देशवासियों को घटना के दो-तीन दिन बाद सोशल मीडिया के जरिये असलियत पता चले!
पिछले साल की शुरुआत में, प्रयागराज में जब कुम्भ मेले में भगदड़ मची तो सोशल मीडिया से ही लोगों ने घटना की भयावहता जानी, सरकारी आंकड़ों में तो बहुत देर तक कोई मरा ही नहीं! और अन्य स्रोतों से पता चलने के बाद जो आधिकारिक आंकड़ा जारी किया गया, उस पर शायद ही किसी ने विश्वास किया हो! पांच साल पहले, कोरोना काल में भी महामारी से जब लोग कीड़े-मकोड़ों की भांति मर रहे थे, तब मृतकों का सही आंकड़ा बताने की बजाय सरकारें कब्रिस्तानों की दीवार की ऊंचाई बढ़ाने में जुटी थीं! उस वक्त भी यह सोशल मीडिया ही था जिस पर लोग नदियों में लाशें तैरती दिखने और गंगा किनारे बालू में शवों को दबाए जाने की खबरें शेयर कर रहे थे.
वास्तविकता छुपाने की सरकारों की कोशिश कोई नई बात नहीं है. वर्ष 1954 में भी प्रयागराज में कुम्भ मेले के दौरान भगदड़ मचने से मौतें हुई थीं. उस समय राज्य सरकार ने कहा था केवल कुछ भिखारी मरे हैं. लेकिन अमृत बाजार पत्रिका ने सैकड़ों लोगों के मरने की खबर छापी. सरकार ने जब इसका खंडन छापने का दबाव डाला तो अखबार के फोटोग्राफर व पत्रकार एन.एन. मुखर्जी अगले दिन फिर मेला क्षेत्र पहुंच गए. वहां एक जगह शवों के ढेर जलाए जा रहे थे, लेकिन किसी भी पत्रकार को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी. चूंकि रिमझिम बारिश हो रही थी, इसलिए मुखर्जी ने एक छाता लिया और जिस थैले में छेद करके अपना कैमरा रखा था, उसे छाते में छुपाकर एक पुलिस अधिकारी के सामने जा पहुंचे कि मुझे भगदड़ में मृत अपनी दादी के अंतिम दर्शन कर लेने दो. पहले तो उसने मना किया लेकिन फिर निर्धन ग्रामीण के वेश में मुखर्जी को रोते-गिड़गिड़ाते देख इस हिदायत के साथ अंदर जाने दिया कि दादी के दर्शन कर तुरंत बाहर निकल आना. भीतर जाकर दादी को ढूंढ़ने का नाटक करते मुखर्जी ने जलती चिताओं की चुपके से कई तस्वीरें खींच लीं, जिनमें महंगे गहने पहनी महिलाओं के शव भी थे. अगले दिन जब ये तस्वीरें अखबार में सबूत के रूप में छपीं तो कहते हैं उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने दांत पीसकर गाली देते हुए कहा था कि ‘कौन है ये हरामजादा फोटोग्राफर?’ हालांकि इस खुलासे के बाद मुखर्जी को कई फर्जी केसों में फंसाया गया और जेल भेजा गया, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री की इस गाली को अपने लिए उसी तरह पुरस्कार स्वरूप माना था जिस तरह गांधीजी ने चर्चिल द्वारा अपने लिए दी गई ‘अधनंगा फकीर’ की अपमानजनक उपमा को.
सरकारें किसी भी दल की हों, उनका चरित्र आम तौर पर एक जैसा रहता है; वरना और क्या कारण हो सकता है कि राजशाही से त्रस्त होकर लोकतंत्र अपनाने वाले नेपाल में नई पीढ़ी को भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ उग्र आंदोलन करना पड़े! या नोबल पुरस्कार विजेता मो. यूनुस को बांग्लादेश का मुखिया बनते ही सत्ता का इतना नशा चढ़ जाए कि चुनाव टालने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगें!
जब सोशल मीडिया का उदय हुआ तब दुनियाभर में सत्ता के इसी चरित्र को बेनकाब किए जाने की उम्मीदें बंधी थीं, क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया की तरह इस पर सरकार या काॅर्पोरेट का कोई दबाव नहीं था. लेकिन कुत्सित प्रवृत्ति के लोगों ने आखिर इसकी भी बलि ले ही ली! अब दुनियाभर के देशों में इसे नई पीढ़ी के लिए बैन करने की होड़ लग गई है. हैरानी की बात है कि जब एलन मस्क जैसे खरबपति का एक्स जैसा मंच लोगों की तस्वीरों को अश्लील बनाने का ग्रोक जैसा टूल्स खुलेआम बेचता है तो सरकारों में उसे प्रतिबंधित करने का वैसा उतावलापन नहीं दिखता! लेकिन यह बात तो गोस्वामी तुलसीदास जी चार सौ साल पहले ही लिख गए हैं कि ‘समरथ कहुं नहिं दोषु गोसाईं...’ इसीलिए रासायनिक हथियारों के झूठे आरोप में इराक को तबाह करने वाले अमेरिका को दंडित करने का साहस किसी में नहीं है बल्कि अश्वमेध के अपने बेलगाम घोड़े को दौड़ाते हुए वह वेनेजुएला के बाद अब ग्रीनलैंड को अपना निवाला बनाने की ताक में है! इधर ऑस्ट्रेलिया में नई पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया बैन किए जाने के बाद फ्रांस में भी इसकी तैयारी पूरी हो चुकी है और ब्रिटेन, डेनमार्क, नॉर्वे, जर्मनी, इटली, दक्षिण कोरिया जैसे कई देश इस कतार में हैं. यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा कि सोशल मीडिया जब इतना ही बुरा है तो वह बड़े लोगों के लिए कैसे भला हो सकता है, उस पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगा दिया जाता?
यह कहावत शायद कालबाह्य हो चुकी है कि ‘चीलर (जूं) के डर से कथरी (बिस्तर) को नहीं फेंका जाता.’ अब असंतोष के कारणों का निदान करने या अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की बजाय असंतुष्टों या हमलावरों को ही खत्म कर देने का चलन दुनिया में है. ऐसे दौर में सोशल मीडिया को बैन करने की जगह साफ-सुथरा बनाने की जहमत उठाए भी तो कौन?
(4 फरवरी 2026 को प्रकाशित)
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