संक्रांति-बेला
जब रात देवताओं की ढलने लगती है
जब प्रकृति शीतनिद्रा से जागा करती है
जब सूर्य उत्तरायण होने लग जाते हैं
तब हम हर साल मकर संक्रांति मनाते हैं।
हम इंसानों की रात मगर कब बीतेगी
कब मानवता का सूर्य उत्तरायण होगा
कब छोड़ तामसिक निशाचरों जैसा जीवन
यम-नियम पालकर सीखेंगे हम अनुशासन?
संक्रांति-काल में यही मांगता ईश्वर से
हम इनसानों को मुफ्त कभी कुछ मत देना
देना ही चाहो यदि कुछ तो
अपने जैसा बन पाने की क्षमता देना !
रचनाकाल : 14 जनवरी 2026
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