नींद

जब नींद बहुत आती थी
तब मैं खुद को कोसा करता था
जो दावा करते हैं
कि सिर्फ सोते हैं घंटे तीन-चार
उनके जैसा बनने की हसरत रखता था।

ढल चुकी उम्र अब
नींद सिर्फ आती है घंटे तीन-चार
बेचैनी से करवटें बदलता रहता हूं
भरपेट नहीं जी पाया जो दिन
उनको फिर पाने की हसरत रखता हूं!

यह सच है उठना सुबह फायदा करता है
पर सहज नींद खुलने में और तोड़ने में
अंतर धरती-आकाश बराबर रहता है
इसलिये जल्द सोने को प्रेरित करता हूं
पर नींद किसी की कच्ची तोड़े जाने से मैं डरता हूं।

रचनाकाल : 31 जनवरी 2026


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