हम तुच्छ लाभ की खातिर क्यों कुर्बान बड़े हित करते हैं ?

 उत्तराखंड में सरकार ने लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. 650 करोड़ रु. खर्च होने के बाद बंद की जाने वाली इस परियोजना के खिलाफ पर्यावरणविद्‌ व आईआईटी प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल ने वर्ष 2018 में ही आमरण अनशन कर 111 दिनों  बाद अपने प्राण त्याग दिए लेकिन सरकार का दिल नहीं पसीजा था. अब पिछले दिनों धराली आपदा में सड़क बहने और नदी के बीच बने डायवर्सन को नुकसान पहुंचने के बाद सुरंगें सील करने का फैसला किया गया है. 

अगर आईआईटी का प्रोफेसर रह चुका व्यक्ति किसी चीज के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहा था तो उसे इतने हल्के में तो नहीं लिया जाना चाहिए था! परंतु शासन की जिस हठधर्मिता को रोकने के लिए प्रकृति को धराली जैसी आपदा लाकर सैकड़ों लोगों की जान लेनी पड़े, वह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत की कीमत पर रुक भी कैसे सकती थी! 650 करोड़ रु. पानी में जाना मामूली बात नहीं है लेकिन जब हमें पता हो कि परियोेजना पूरी होने के बाद कितनी जबर्दस्त तबाही मचती तो शायद यह नुकसान भी कम लगता है. हमें जानना चाहिए कि बांध सिर्फ पानी ही नहीं रोकते, जलीय जीवों के पूरे जीवन-चक्र को बाधित कर देते हैं. प्रो. अग्रवाल की चिंता थी कि हिल्सा मछली, जो  बंगाल की खाड़ी से ऊपर तक यानी गंगोत्री और बद्रीनाथ तक अंडे देने जाती है, बांध बनने के बाद ऊपर कैसे जा पाएगी? इसी तरह गंगा में पाई जानेवाली विशेष डॉल्फिन अब नीचे नहीं आ पाती हैं.  

हम मनुष्य खुद को भले ही सर्वाधिक बुद्धिमान मानें लेकिन वास्तव में हमारी तर्कबुद्धि स्वार्थपूर्ति का औजार ही रही है. हर मनुष्य अपने स्वार्थ के पक्ष में तर्क गढ़ लेता है. जब दुनिया में सुख-सुविधा के अत्याधुनिक साधन नहीं थे, तब दास प्रथा आम थी और बड़े-बड़े विद्वान भी इसे गलत नहीं मानते थे क्योंकि तब समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग की सेवा कौन करता? जिस अंग्रेज जाति को अपनी न्यायप्रियता का अहंकार रहा है, उसने सदियों तक अगर करीब आधी दुनिया को अपना गुलाम बनाए रखा तो इसका कारण आखिर और क्या हो सकता है? हमारे देश का जैसा निर्मम शोषण उन्होंने किया उसे भारत का बच्चा-बच्चा महसूस करता था लेकिन ब्रिटेन के बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को भी अगर वह दिखाई नहीं पड़ता था तो सिर्फ इसलिए कि इससे उन्हें फायदा हो रहा था. 

लेकिन अपना फायदा ही तो दुनिया के सारे प्राणी देखते हैं, फिर इसमें गलत क्या है? 

जंगल में पशुबल ही कानून होता है. बिल्ली को कुत्ते खा जाते हैं और चूहे को बिल्ली. हम मनुष्य अगर पाशविक बल की सोच से ऊपर उठ पाए तो शायद इसीलिए कि अतीत में हमारे स्वार्थ के दायरे में पूरी दुनिया का हित समाया रहा होगा. दरअसल जब हम स्वार्थ के सबसे छिछले स्तर पर सोचते हैं तो सिर्फ तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हैं लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से सोचने पर समझ में आता है कि अगर दूसरों का भला करेंगे तो वही भलाई पलट कर हमारे पास आएगी. कहानी है कि एक बार असुरों ने भगवान से शिकायत की कि हम भी तो आप ही की संतान हैं, फिर आप देवताओं से पक्षपात क्यों करते हैं? भगवान ने देवों-दैत्यों को अलग-अलग समूह में इकट्ठा किया और सबके हाथ में एक-एक लकड़ी बांध दी. फिर स्वादिष्ट भोजन की थाली सबके सामने रखवाकर कहा कि उसे खाएं. चूंकि लकड़ी बंधी होने से हाथ मुड़ नहीं सकता था, इसलिए असुरों ने खाने की कोशिश में सारा खाना जमीन पर गिरा दिया. उधर देवताओं ने हाथ सीधा रखते हुए भी एक-दूसरे को खिलाया और सबका पेट भर गया. तब भगवान ने असुरों को समझाया कि जो अपने बारे में सोचते हैं, उनके बारे में मैं नहीं सोचता लेकिन जो दूसरों का ध्यान रखते हैं, उनका ध्यान मैं रखता हूं. 

हम मनुष्य जब तक प्रकृति का ध्यान रखते रहे तब तक प्रकृति भी हमारा ध्यान रखती रही, लेकिन अब जब हम पर्यावरण को तबाह करने पर तुले हैं तो प्रकृति भी तबाही लाने लगी है. ऐसा नहीं है कि प्रो. जी.डी. अग्रवाल मानव जाति के हितों के खिलाफ थे, लेकिन वे देख पा रहे थे कि तात्कालिक फायदों के लिए हम किस तरह से अपने दीर्घकालिक भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मूढ़ताएं आज हमें कितनी भी हास्यास्पद लगें, लेकिन अगर हमने विकास का अपना तरीका नहीं बदला तो हम सबका हाल भी ट्रम्प जैसा ही होना है, क्योंकि एक सीमा के बाद हम स्वार्थ में इतने अंधे हो जाते हैं कि महसूस ही नहीं होता विवेक नाम की भी कोई चीज होती है. दुनिया में ट्रम्प की बेशर्मी के नंगे नाच को देखकर भी अगर अमेरिकियों को शर्म नहीं आ रही है तो इसीलिए कि उन्हें लग रहा है वे उनके फायदे के लिए यह सब कर रहे हैं. असम्भव नहीं है कि निकट भविष्य में ट्रम्प की ही राह दुनिया के सारे देश अपना लें और ट्रम्पवादी सोच समूची मानव जाति को फिर से जंगली जानवरों की श्रेणी में ला खड़ा करे, जहां पशुबल को ही कानून माना जाता है! 

(28 जनवरी 2026 को प्रकाशित)

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