सपने में अपराध

कभी-कभी सपने में खुद को
अपराधी मैं पाता हूं
खुलती है पर जब नींद
स्वयं पर ही शर्मिंदा होता हूं
मैं कैसे इतना नीचे तक गिर सकता हूं!

अपराध कभी जो किये नहीं
प्रायश्चित उनका करता हूं
जो सजा कहीं से मिली नहीं
उसको खुद भोगा करता हूं
बाहर से सबको सुखी भले ही दिखता हूं!

सच तो यह है जो स्वेच्छा से सह लेता है
दु:ख मजबूरी में उसे न सहने पड़ते हैं
सपने में भी अपराध अगर हो जाये तो
जो खुद ही उसका परिमार्जन कर लेते हैं
वे सचमुच के अपराध से बचे रहते हैं।

रचनाकाल : 18 जनवरी 2026

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