हम पे इल्जाम न आए कि कहा चोर को क्यों चोर नहीं !

 इन दिनों दुनियाभर में उथल-पुथल मची है. कहीं युद्ध हो रहे हैं तो कहीं गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. नियम-कायदों की इस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं कि लगता है हम फिर से तो जंगलराज की ओर तो नहीं लौट रहे? यूक्रेन में रूसी हमले का विरोध करने और ताइवान पर आक्रमण के खिलाफ चीन को चेतावनी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया की सबसे बड़ी गुंडागर्दी दिखाते हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति का सपत्नीक अपहरण कर लिया. दिक्कत यह है कि बड़े गुंडों का ही अनुकरण छोटे गुंडे भी करते हैं, इसलिए कहीं ऐसा न हो कि दुनिया में अपहरण को अवैध मानना बंद कर दिया जाए और यह एक उद्योग का रूप धारण कर ले! इसके लिए जरूरी अर्हता भी सिर्फ अपहरणकर्ता का ताकतवर होना होगी, अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस! और ऐसा भी नहीं कि इससे अपहर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आएगी, आखिर ट्रम्प को भी तो बहुत से लोग अपना आदर्श मानते ही हैं और वेनेजुएला की नोबल विजेता विपक्षी नेता मारिया मचाडो ने तो अपना नोबल मेडल तक ट्रम्प को सौंप दिया (यह बात अलग है कि नोबल समिति ने कहा है कि नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद उसे रद्द, शेयर या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता)!

दुनिया में लड़ाइयां पहले भी होती थीं, लेकिन उनके कुछ नियम-कायदे होते थे. महाभारत में जिक्र है कि सूरज डूबने के बाद कोई एक-दूसरे पर शस्त्र नहीं उठाता था और दुश्मन के खेमे में भी लोग बेधड़क आते-जाते थे. बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर हाथ नहीं उठाने का नियम था. रावण ने सीता का अपहरण भले कर लिया लेकिन जबरन हाथ लगाने की हिम्मत वह भी नहीं जुटा सका था. अभी कुछ दशक पुरानी ही बात है जब आस-पड़ोस या घर-परिवार में बड़ों के बीच झगड़ा होता, तब भी बच्चों के एक-दूसरे के घर आने-जाने में कोई रोक-टोक नहीं होती थी. परिवार में भाई-भतीजों के बीच खानदान भले ही टूट जाए लेकिन एक-दूसरे की बहन-बेटियों को घर के हर आयोजन में बुलाया जाता था. गांधीजी ने जिन अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर भारत को आजादी दिलाई थी, उन्हीं अंग्रेजों के देश इंग्लैंड की संसद के सामने हमारे राष्ट्रपिता की प्रतिमा स्थापित है तो सिर्फ इसलिए कि लड़ाई का उनका तरीका बेमिसाल था. 

नामचीन शायर बशीर बद्र ने लिखा है, ‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.’ संसद में कांग्रेस सरकार की बखिया उधेड़ने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पता चला कि किडनी की गंभीर बीमारी के इलाज के लिए वे अर्थाभाव के कारण अमेरिका नहीं जा पा रहे हैं तो संयुक्त राष्ट्र के भारतीय प्रतिनिधिमंडल में उनका नाम शामिल करवा दिया था, ताकि उसी दौरान उनका इलाज भी हो सके. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा कल्याण की लड़ाई जीतने के बाद जब मुगल घराने की एक खूबसूरत बेगम को बंदी बनाकर लाया गया तो उन्होंने उसे अपनी मां के समान सम्मान देते हुए पांच सौ घुड़सवारों के साथ सुरक्षित मुगल खेमे में भिजवाने की व्यवस्था की थी. 

क्या हमें आज इस बात का जरा भी अहसास है कि दुश्मनी के अर्थ को हमने कितने लज्जाजनक स्तर तक नीचे गिरा दिया है! पहले लोग जितना भरोसा अपने दुश्मनों पर कर लेते थे, उतना क्या आज हम अपने दोस्तों पर भी कर पाते हैं? समय कभी रुकता नहीं है, पीढ़ियां आती हैं और जाती हैं लेकिन उनके अच्छे-बुरे काम लम्बे समय तक जनमानस की स्मृतियों में बने रहते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इतिहास के जिन चरित्रों को हम खलनायक मानते हैं, हमारे आज के नायकों को आगामी इतिहास उनसे भी टुच्चे व्यक्ति के रूप में याद करे! 

कहते हैं रामचंद्रजी की वानर सेना जब रावण से लड़ने जाने के लिए समुद्र में पुल बना रही थी तो एक गिलहरी भी अपने मुंह से छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर ले जाकर उसमें डाल रही थी. किसी ने जब कहा कि तुम व्यर्थ ही थक रही हो, इन छोटे-छोटे कंकड़-पत्थरों से कुछ नहीं होगा, तो गिलहरी ने जवाब दिया, ‘मैं जानती हूं मेरा योगदान नगण्य है, लेकिन मैं चाहती हूं कि इतिहास जब लिखा जाए तो मेरा नाम बुराई नहीं, अच्छाई के पक्ष में दर्ज हो.’ 

हो सकता है हमारी भी हैसियत इतिहास को दिशा देने में उस गिलहरी की तरह बहुत ज्यादा न हो, लेकिन क्या हम खुद को यह भरोसा दिला सकते हैं कि एक व्यक्ति या देश के तौर पर इतिहास में हमारा नाम भी दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिश करने वालों के पक्ष में ही लिखा जाएगा! 

(21 जनवरी 2026 को प्रकाशित)

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