जब असभ्यता ही बन जाए शिष्टाचार तो क्या कीजे !
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में हाल ही में एक स्तब्ध कर देने वाला वाकया हुआ. वहां आयोजित एक राष्ट्रीय परिसंवाद में कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल ने अपने हल्के-फुल्के और चुटकुलों से भरे (जाहिर है विषय से परे) वक्तव्य के दौरान जब सामने बैठे आमंत्रित साहित्यकार मनोज रूपड़ा से अनायास ही पूछा कि ‘आप बोर तो नहीं हो रहे!’ तो रूपड़ा ने सहज ही कह दिया कि ‘आप विषय पर बात कीजिए.’ इस जवाब से कुलपति इतने कुपित हुए कि रूपड़ा को अपमानित करते हुए कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें दोबारा किसी कार्यक्रम में न बुलाया जाए.
अब चर्चा जितनी कुलपति की अभद्रता की हो रही है, उतनी ही वहां मंच पर तथा हाॅल में मौजूद साहित्यकारों व अन्य प्रतिष्ठित जनों की चुप्पी की भी. कहा जा रहा है कि वहां मौजूद लोग अगर इस उजड्डता को खामोशी से सह नहीं लेते तो कुलपति महोदय को माफी मांगने के लिए मजबूर किया जा सकता था.
इसमें कोई शक नहीं कि कुलपति की प्रतिक्रिया बहुत ही निम्नस्तरीय थी लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि यह कोई पूर्वनियोजित नहीं थी. कुलपति की रूपड़ा से कोई दुश्मनी तो थी नहीं, शायद वे उन्हें पहचानते भी न रहे हों और सतही सवाल पर रूपड़ा के रूखे जवाब से अपने उथले स्वाभिमान को मिर्ची लगने के कारण अनायास ही उनका वास्तविक स्वरूप सामने आ गया हो! किसी ने सही कहा है कि आदमी का असली चेहरा गुस्से में ही सामने आता है क्योंकि उस समय वह खुद को मुखौटों के पीछे छिपा नहीं पाता. ऐसे में कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी क्या सवाल नहीं उठना चाहिए कि इस तरह के उथले व्यक्ति इतने प्रतिष्ठित पदों तक पहुंच कैसे जाते हैं?
जहां तक वहां उपस्थित सुधीजनों की चुप्पी का सवाल है तो यह भी हो सकता है कि अचानक हुए इस वाकये से वे हक्के-बक्के रह गए हों और तत्काल कोई फैसला न कर पाए हों कि क्या करें. लेकिन सोच-विचार के बाद भी तो वे अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे! हमें याद रखना चाहिए कि दुर्योधन द्वारा भरी सभा में दु:शासन से द्रौपदी का चीर हरण करवाने के दौरान भीष्म और द्रोण जैसे सुधीजन भी इसी तरह चुप रह गए थे और इसके लिए इतिहास ने उन्हें आज तक माफ नहीं किया है. कहा जाता है कि राजा धृतराष्ट्र का नमक खाने अर्थात उनके अन्न पर पलने के कारण वे दुर्योधन के अन्याय का विरोध नहीं कर पाए थे. तो क्या सरकारी कृपापात्रों की सूची से नाम कटने के डर से ही परिसंवाद में आमंत्रित लोगों ने कुलपति की अभद्रता के खिलाफ अपना विरोध दर्ज नहीं कराया? एहसान तले दबने के शायद इसी डर से पहले के विद्वान ब्राह्मण दरिद्र हुआ करते थे. विद्योपार्जन की धुन में उन्हें धनोपार्जन के लिए समय नहीं मिल पाता होगा और राजा-महाराजों का कृपापात्र बनकर, गलत फैसलों के लिए उनकी आलोचना करने और सही राह दिखाने का अपना अधिकार खो देना उन्हें मंजूर न होता होगा!
अभी बहुत दशक नहीं बीते जब गांवों में धनाढ्य होते हुए भी सूदखोर महाजनों का स्थान सामाजिक प्रतिष्ठा के मामले में सबसे निचले पायदान पर होता था. आज बड़े-बड़े अपराधियों, गुंडे-बदमाशों के साथ अपने संबंधों का दिखावा करने को लोग शर्म की बजाय क्या शान की बात नहीं समझने लगे हैं? फिर सरकारी सुविधाएं दिला सकने की क्षमता रखने वाले कुलपति से बिगाड़ करके लोग उस लेखक का समर्थन क्यों करें जो उनका धेले भर का स्वार्थ साधने के भी काम नहीं आ सकता! आम जनता में तो आज सरकारों द्वारा चुनावों को ध्यान में रखकर बांटे जाने वाले मुफ्त के माल को हथियाने की होड़ लगी ही है (कई नेता तो अब चुनावों के दौरान मतदाताओं को यह तक सलाह देते हैं कि उनके प्रतिद्वंद्वी नेताओं से पैसा भी ले लो और उन्हें वोट भी मत दो, लेकिन लोगों की चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं हुई है कि वे एहसान फरामोशी के इस निम्नतम स्तर तक गिर जाएं), हमारे कितने बुद्धिजीवी भी आखिर सरकारी एहसानों को ठुकरा पाने की क्षमता रखते हैं?
शायद यही कारण है कि हम एक कुलपति के द्वारा किसी साहित्यकार को ही जलील किए जाते हुए चुपचाप देखते नहीं रह जाते, बल्कि देश-दुनिया में कई तरह के अन्यायों को देखते हुए भी सिर्फ इसलिए चुप रह जाते हैं कि कहीं हमारे हितों पर कुठाराघात न हो जाए! आखिर सच बोलने या उसके पक्ष में खड़े होने की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है और हम में से कितने लोग वह कीमत अदा करने को तैयार हैं?
(14 जनवरी 2026 को प्रकाशित)
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