स्वीकारोक्ति
हमको बचपन में ऐसे मिले थे बड़े
जो रुकावट नहीं रास्ते के बने
फूल खिलते हैैं जैसे सहज भाव से
हमको भी खेलने और खिलने दिया
माफ कर देना बच्चो हमारे, हमें
हम तुम्हारे न बन पाये वैसे बड़े।
हमने बचपन में कीं जो मटरगश्तियां
खूब खतरों से खेलीं कलाबाजियां
होता रोमांच यादों से भी आज जो
वैसे दुस्साहसों से बचाया तुम्हे
घर के भीतर रखा सेफ ही जोन में
किंतु कमजोर भी तो इसी से किया!
हमने क्या-क्या बनाना न चाहा तुम्हें
किंतु इच्छा न जानी तुम्हारी कभी
था मिला हमको आकाश उन्मुक्त पर
बांध कर डोर ही तुमको उड़ने दिया
माफ कर देना बच्चो हमारे, हमें
हम न बन पाये अच्छे तुम्हारे बड़े!
रचनाकाल : 15 दिसंबर 2025
सहजता और उन्मुक्तता का अभाव अब सचमुच कचोटता है।
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