प्रशासकों का बेतुकापन और अंधेर नगरी के अवशेष
इसी तरह दिल्ली में कहते हैं बिजली और पानी एक निश्चित सीमा तक फ्री है लेकिन तय सीमा से जरा भी ज्यादा खपत होने पर पूरे उपभोग का पैसा देना पड़ता है. ऐसे में कोशिश करने पर भी जिसका इस्तेमाल तय सीमा से थोड़ा ज्यादा हो जाए, वह अपने मन में सरकार के प्रति आक्रोश पैदा होने से खुद को रोक नहीं पाता.
यह तो हुई बड़े-बड़े लेवल की बातें, छोटे स्तरों पर भी ऐसी घटनाएं कम नहीं होतीं जिन्हें समझने के लिए तर्क को सिर के बल खड़ा होना पड़े. कुछ साल पहले एसटी महामंडल ने एक रूट पर एक स्टाप का जो किराया रखा था, आधी-आधी दूरी की दो टिकट लेकर उस स्टाप तक कम पैसे में पहुंचा जा सकता था. ऐसा करने के पीछे एसटी महामंडल का तर्क जो भी रहा हो, लेकिन नियमित यात्रियों ने आधी-आधी दूरी के दो पास बनवाकर पैसे बचाना जरूर शुरू कर दिया था.
पुराने जमाने के शासकों के कई फैसले आज हमें बेतुके लगते हैं. अंग्रेजों तक ने अविभाजित भारत में राज करते समय एक पेड़ को इसलिये जंजीर से बंधवा दिया था कि नशे में धुत एक अंग्रेज अधिकारी को लगा कि वह पेड़ उसकी हत्या कर देगा. आज भी इस जंजीर बंधे पेड़ को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में देखा जा सकता है.
भारतेंदु हरिश्चंद्र की ‘अंधेर नगरी’ पता नहीं कभी सचमुच में थी भी या नहीं, बेतुकेपन की पराकाष्ठा मानकर आज हम उस पर हंसते जरूर हैं. लेकिन हर दौर के शासन में क्या कुछ न कुछ बेतुके काम होते हैं और हमारा अपना दौर भी इसका अपवाद नहीं है?
(13 अगस्त 2024 को प्रकाशित)

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