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अंधाधुंध दौड़ से बढ़ती यांत्रिकता और कुंद होती प्रतिभा

 वैसे तो बहुत सारी चीजें डमी होती हैं लेकिन क्या आपने कभी सुना कि स्कूल भी डमी होते हैं? और वह भी सीबीएसई से सम्बद्ध स्कूल! लेकिन सीबीएसई अर्थात केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की हालिया चेतावनी बताती है कि वे होते हैं और बोर्ड ने कहा है कि डमी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले छात्रों को परीक्षा से वंचित किया जा सकता है. डमी अर्थात ऐसे स्कूल जहां छात्र प्रवेश तो लेते हैं लेकिन क्लास अटैंड नहीं करते. ऐसे स्कूलों का कोचिंग संस्थानों से टाय-अप होता है, जिससे स्कूलों को अपनी फीस मिल जाती है, और छात्रों को कोचिंग में पढ़ने के लिए पूरा समय. चूंकि सिलेबस एक ही होता है, इसलिए छात्र स्कूल गए बिना ही बारहवीं की परीक्षा भी पास कर लेते हैं. लेकिन आज के जमाने में, जब साध्य को ही सबकुछ माना जाता है, छात्रों द्वारा परीक्षा में अच्छे नंबर लाने के बावजूद सीबीएसई उन्हें ‘चेतावनी’ क्यों दे रहा है? एक और महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि छात्रों को कक्षा में आने के लिए ‘मजबूर’ करने के बजाय उन्हें इसके लिए ‘आकर्षित’ करना क्या ज्यादा सही तरीका नहीं होगा? सीबीएसई ने अपनी चेतावनी के कारणों का खुलासा भले न किया हो, ल...

पलायन नहीं, प्रतिरोध

मेहनत लगती थी भले मगर मैं खुशी-खुशी साइकिल चलाया करता था लगता था पर्यावरण बचाने में है मेरा योगदान हो रहे लोग भी जागरूक उस तरह न हीन समझते हैं। पर कहा एक दिन आफिस में जब सिक्योरिटी के साहब ने कोने में ही साइकिल रखो सब छेंक रहे हैं जगह साइकिल वाले बढ़-बढ़ कर आगे मानो सारा भ्रम टूट गया साइकिल उसी दिन से ही लाना छोड़ दिया। जब कविता अपने आप छपी अखबार एक प्रादेशिक में पूछा वरिष्ठ सहयोगी ने कैसे यह इतनी दूर छपी यह कहीं ‘बार्टर’ का तो नहीं मामला है! यद्यपि कह दिया उन्होंने यह था बस मजाक पर लगा मुझे क्यों लोग न समझें लेन-देन या मिलीभगत दुनिया में चल तो यही रहा है सभी जगह! तो दिखने को ईमानदार क्या पत्रकारिता या कविता में एक किसी की देनी होगी कुर्बानी? आया था शहर गांव से जब कारण था यही कि खेती में दुर्दशा नहीं बैलों की देखी जाती थी अब करता श्रम, पाता वेतन शोषण न शहर में दिखता है पर सचमुच क्या वैसा है जैसा दिखता है? अब लगता है मैं करता आया सदा पलायन संकट से बैलों की करके सेवा उनसे काम खेत में लेना था अधिकार साइकिल रखने खातिर पाने को प्रतिरोध सुपरवाइजर गार्ड का करना था सहयोगी कुछ भी समझें पर कविता...

बेहद डरावनी है कुएं में ही भांग घुली होने की आशंका

 एक माननीय न्यायदाता के सरकारी आवास पर दिखे नोटों के जले-अधजले बंडलों के ढेर ने पूरे देश को सन्न कर दिया है. भ्रष्टाचार देश या दुनिया के लिए नई बात नहीं है और धनकुबेरों के घरों से इतनी नगदी बरामद होने की खबरें अक्सर आती रहती हैं जिसे गिनने में मशीनें तक थक जाती हैं. लेकिन कहावत है कि चादर अगर साफ हो तो दाग ज्यादा गहरे दिखते हैं. इसमें दो राय नहीं कि देश में अगर किसी भी विभाग की चादर सबसे ज्यादा साफ है तो वह न्यायपालिका ही है. विपक्ष या विरोधियों को भी और किसी पर विश्वास हो या नहीं, न्यायपालिका पर सबका भरोसा निर्विवाद है. इसीलिए न्यायपालिका को अनावश्यक आलोचनाओं से बचाव का सुरक्षा-कवच भी मिला हुआ है ताकि छिद्रान्वेषी तत्व उसकी गरिमा को गिराने की कोशिश न करें.  लेकिन जब लोगों को लगने लगे कि कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है तो तरह-तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगती हैं. छिपे हुए को जानने की मनुष्य के भीतर स्वाभाविक जिज्ञासा होती है, इसलिए अफवाहों को रोकने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यह है कि संबंधित पक्षों द्वारा स्थिति को पहले ही पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया जाए और अगर कहीं अपराध हुआ है तो दंड...

गरिमामय जीवन

पहले मुझको यह लगता था सब बीत चुके सतयुग, त्रेता या द्वापर युग दुनिया में इतने बड़े हो चुके महापुरुष हम कभी नहीं उनके कद को छू पायेंगे दुनिया में बौने बनकर ही रह जायेंगे! पर मिले विरासत में यदि हमें खण्डहर तो क्या हम ही बस उसके दोषी कहलायेंगे जो कठिन समय आया हिस्से में जीवन के क्या उसका कोई मूल्य नहीं झेला विनाश, फिर भी क्या सदा विनाशक माने जायेंगे? महसूस मगर यह होता है इतिहास नहीं इतना निर्मम हो सकता है कोशिश यदि हम ईमानदार कर सकें मिले जो हिस्से में खण्डहर उन्हीं से सृजन नया कर सकें भले वह नजर न आये भव्य महल संघर्षों की गाथा के लेकिन शिलालेख बन जायेंगे टूटे-फूटे ही सही मगर अपनी नजरों में कम से कम गरिमामय तो बन पायेंगे! रचनाकाल : 20-21 मार्च 2025

डर

बेचैनी इतनी ज्यादा है पागल ही कहीं न हो जाऊं डर लगता है। दुनिया में व्याकुल रहने के कारण पर इतने ज्यादा हैं सो जाऊं लेकर अगर दवा बेचैनी खत्म न हो जाये आदत न कहीं सुख से रहने की पड़ जाये इससे ज्यादा डर लगता है। रचनाकाल : 9 मार्च 2025

जवानी में वरदान और बुढ़ापे में अभिशाप बनती अमरता की चाह

 अमर होने की हम मनुष्यों की चाहत कोई नई बात नहीं है. हजारों साल से इसीलिए अमृत की खोज की जाती रही है. अपनी जवानी को लंबा करने के लिए बेटे की उम्र मांग लेने की राजा ययाति की पौराणिक कथा जगप्रसिद्ध है. कुछ समय पहले एक प्रसिद्ध अरबपति द्वारा बेटे का प्लाज्मा अपने  शरीर में इंजेक्ट करवाने की खबर आई थी. अब अमेरिका की एक महिला ने खुलासा किया है कि वह अपनी जवानी बरकरार रखने के लिए अपने बेटे के खून का इस्तेमाल करने वाली है. हालांकि वैज्ञानिक चेतावनी देते रहे हैं कि इसके गंभीर स्वास्थ्य परिणाम हो सकते हैं लेकिन भोग-विलास की लालसा इतनी प्रबल है कि पागलपन थम नहीं रहा! प्राचीन विद्वान संतुलन के महत्व को जानते थे. इसीलिए उन्होंने मानव जीवन को चार आश्रमों(भागों) में बांटा था- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास. मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मानते हुए उन्होंने प्रत्येक आश्रम के लिए 25-25 वर्ष निर्धारित किए थे. शुरुआती 25 वर्ष विद्याध्ययन के बाद 25 से 50 वर्ष तक की उम्र गृहस्थाश्रम के लिए निर्धारित थी. उसके बाद अगले 25 वर्ष वह सलाहकार की भूमिका में रहता था और 75 वर्ष का होते ही संन्यास लेकर...

विरासत उत्सव की

क्या हुआ प्राकृतिक रंग मिलते नहीं केमिकल ही कलर खेल लो दोस्तो ये विरासत कोई ऐसी-वैसी नहीं होली जी-भर मनाते चलो दोस्तो। अब न फगुहार पहले के जैसे रहे टोलियों में जो जाते थे हर एक घर छेड़ते थे जोगीड़ा की धुन सऽरऽरऽर अब न फसलें कोई काटता हाथ से सारे बच्चे चले गये शहर काम से फूल खिलते हैं टेसू के अब भी मगर रंग उनसे बनाता है कोई नहीं कुछ भी तो पहले जैसा बचा अब नहीं! फिर भी होली-दिवाली के त्यौहार ये चलते ही आ रहे अनगिनत साल से क्या पता ये भी दिन कितने टिक पायेंगे पेड़ जर्जर न कब जाने ढह जायेंगे बन के यादें ही स्मृतियों में रह जायेंगे! ये हैं त्यौहार मामूली कोई नहीं इनमें कितने युगों की हैं यादें बसीं देंगे सम्बल कठिन ये समय में सभी हो सके तो बचा लो इन्हें दोस्तो! रचनाकाल : 14 मार्च 2025