भोग से त्याग की ओर
तुम जितना ही सुख-सुविधाओं में जीते हो मैं स्वेच्छा से उतनी तकलीफें सहता हूं तुम धरती के संसाधन करते खत्म लगाकर पेड़ उसे समृद्ध बनाने की कोशिश मैं करता हूं। यह सच है मेरी शक्ति बहुत है अल्प तुम्हारी तुलना में पहुंचाते तुम जितना ज्यादा नुकसान बहुत ही कम उसकी भरपाई मैं कर पाता हूं पर तेज हवा में भी चिनगारी बुझे नहीं इसकी खातिर ही पूरा जोर लगाता हूं मन में है दृढ़ विश्वास, कभी तो ऐसा भी दिन आएगा चिनगारी मेरी दावानल बन जाएगी जो लगती अभी खिलाफ, हवा वह ही उसको फैलाएगी तुम राह भोग की छोड़, त्याग को जीवन में अपनाओगे सब जीव चराचर नहीं बने हैं हम इनसानों की खातिर हम मानव ही सबकी खातिर हैं बने कभी यह सत्य समझ तो पाओगे! (रचनाकाल : 17 जून 2025)