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सरलता के फायदे

मैं पहले टेढ़ी बातें जल्दी समझ ही नहीं पाता था जब लोग व्यंग्य करते उसको सचमुच तारीफ समझता था। क्षमता लेकिन जबसे पाई यह समझ सकूं है कौन कुटिल मैं भी न सरल पहले जैसा रह सका कुटिलता लगी समाने मुझमें भी! इसलिये सरल बनने की ही अब फिर से कोशिश करता हूं टेढ़ी बातों का सहकर भी आघात सरल-सीधा जवाब ही देता हूं टेढ़ों की टेढ़े ही जानें मैं तो अपनी दुनिया में ही खुश रहता हूं। रचनाकाल : 22 जनवरी 2026

सपने में अपराध

कभी-कभी सपने में खुद को अपराधी मैं पाता हूं खुलती है पर जब नींद स्वयं पर ही शर्मिंदा होता हूं मैं कैसे इतना नीचे तक गिर सकता हूं! अपराध कभी जो किये नहीं प्रायश्चित उनका करता हूं जो सजा कहीं से मिली नहीं उसको खुद भोगा करता हूं बाहर से सबको सुखी भले ही दिखता हूं! सच तो यह है जो स्वेच्छा से सह लेता है दु:ख मजबूरी में उसे न सहने पड़ते हैं सपने में भी अपराध अगर हो जाये तो जो खुद ही उसका परिमार्जन कर लेते हैं वे सचमुच के अपराध से बचे रहते हैं। रचनाकाल : 18 जनवरी 2026

हम पे इल्जाम न आए कि कहा चोर को क्यों चोर नहीं !

 इन दिनों दुनियाभर में उथल-पुथल मची है. कहीं युद्ध हो रहे हैं तो कहीं गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. नियम-कायदों की इस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं कि लगता है हम फिर से तो जंगलराज की ओर तो नहीं लौट रहे? यूक्रेन में रूसी हमले का विरोध करने और ताइवान पर आक्रमण के खिलाफ चीन को चेतावनी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया की सबसे बड़ी गुंडागर्दी दिखाते हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति का सपत्नीक अपहरण कर लिया. दिक्कत यह है कि बड़े गुंडों का ही अनुकरण छोटे गुंडे भी करते हैं, इसलिए कहीं ऐसा न हो कि दुनिया में अपहरण को अवैध मानना बंद कर दिया जाए और यह एक उद्योग का रूप धारण कर ले! इसके लिए जरूरी अर्हता भी सिर्फ अपहरणकर्ता का ताकतवर होना होगी, अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस! और ऐसा भी नहीं कि इससे अपहर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आएगी, आखिर ट्रम्प को भी तो बहुत से लोग अपना आदर्श मानते ही हैं और वेनेजुएला की नोबल विजेता विपक्षी नेता मारिया मचाडो ने तो अपना नोबल मेडल तक ट्रम्प को सौंप दिया (यह बात अलग है कि नोबल समिति ने कहा है कि नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद उसे रद्द, शेयर या ट्रांस...

उन्नति क्या इसको कहते हैं?

अनुभव से जब सीखा करता चीज नई खुश होता हूं, पर पछतावा भी होता है पहले ही सीख लिया होता तो इतने दिन इस सुविधा से वंचित न रहा आया होता! पर याद आता प्राचीनकाल जब छोटी-छोटी चीज सीखने में भी कितनी ही सदियां लग जाती थीं जो आग सुलभ है आज जरा सी तीली में क्या नहीं हजारों साल लगे थे उस पर काबू पाने में! पहिये ने की आसान जिंदगी बहुत, मगर होने में उसे परिष्कृत जाने कितनी सदी लगी होगी! हम आज बहुत ही विकसित हैं पर इसकी खातिर कर्जदार पुरखों के हैं जैसे दूने से चार गुना, फिर आठ गुना हो जाता है उन्नति भी हम इस तरह गुणात्मक करते हैं जब संख्या छोटी होती है तब नहीं गुणनफल उसका ज्यादा होता है पुरखों ने किया विकास शून्य के पहले से इसलिये हजारों साल लगे उनको जीरो तक आने में हमको इतनी समृद्ध विरासत मिली कि द्विगुणित कुछ वर्षों में ही सबकुछ हो जाता है जीवन आसान निरंतर होता जाता है। संघर्षों में लेकिन जो बीता करता था कैसे हम अब वह समय बिताया करते हैं! क्या सुविधाभोगी जीवन बन जाने को ही सचमुच में उन्नति कहते हैं? रचनाकाल : 15-18 जनवरी 2026

संक्रांति-बेला

जब रात देवताओं की ढलने लगती है जब प्रकृति शीतनिद्रा से जागा करती है जब सूर्य उत्तरायण होने लग जाते हैं तब हम हर साल मकर संक्रांति मनाते हैं। हम इंसानों की रात मगर कब बीतेगी कब मानवता का सूर्य उत्तरायण होगा कब छोड़ तामसिक निशाचरों जैसा जीवन यम-नियम पालकर सीखेंगे हम अनुशासन? संक्रांति-काल में यही मांगता ईश्वर से हम इनसानों को मुफ्त कभी कुछ मत देना देना ही चाहो यदि कुछ तो अपने जैसा बन पाने की क्षमता देना ! रचनाकाल : 14 जनवरी 2026

जब असभ्यता ही बन जाए शिष्टाचार तो क्या कीजे !

 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में हाल ही में एक स्तब्ध कर देने वाला वाकया हुआ. वहां आयोजित एक राष्ट्रीय परिसंवाद में कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल ने अपने हल्के-फुल्के और चुटकुलों से भरे (जाहिर है विषय से परे) वक्तव्य के दौरान जब सामने बैठे आमंत्रित साहित्यकार मनोज रूपड़ा से अनायास ही पूछा कि ‘आप बोर तो नहीं हो रहे!’ तो रूपड़ा ने सहज ही कह दिया कि ‘आप विषय पर बात कीजिए.’ इस जवाब से कुलपति इतने कुपित हुए कि रूपड़ा को अपमानित करते हुए कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें दोबारा किसी कार्यक्रम में न बुलाया जाए.  अब चर्चा जितनी कुलपति की अभद्रता की हो रही है, उतनी ही वहां मंच पर तथा हाॅल में मौजूद साहित्यकारों व अन्य प्रतिष्ठित जनों की चुप्पी की भी. कहा जा रहा है कि वहां मौजूद लोग अगर इस उजड्डता को खामोशी से सह नहीं लेते तो कुलपति महोदय को माफी मांगने के लिए मजबूर किया जा सकता था. इसमें कोई शक नहीं कि कुलपति की प्रतिक्रिया बहुत ही निम्नस्तरीय थी लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि यह कोई पूर्वनियोजित नहीं थी. कुलप...

भोग से त्याग की ओर

तुम जितना ही सुख-सुविधाओं में जीते हो मैं स्वेच्छा से उतनी तकलीफें सहता हूं तुम धरती के संसाधन करते खत्म लगाकर पेड़ उसे समृद्ध बनाने की कोशिश मैं करता हूं। यह सच है मेरी शक्ति बहुत है अल्प तुम्हारी तुलना में पहुंचाते तुम जितना ज्यादा नुकसान बहुत ही कम उसकी भरपाई मैं कर पाता हूं पर तेज हवा में भी चिनगारी बुझे नहीं इसकी खातिर ही पूरा जोर लगाता हूं मन में है दृढ़ विश्वास, कभी तो ऐसा भी दिन आएगा चिनगारी मेरी दावानल बन जाएगी जो लगती अभी खिलाफ, हवा वह ही उसको फैलाएगी तुम राह भोग की छोड़, त्याग को जीवन में अपनाओगे सब जीव चराचर नहीं बने हैं हम इनसानों की खातिर हम मानव ही सबकी खातिर हैं बने कभी यह सत्य समझ तो पाओगे! (रचनाकाल : 17 जून 2025)