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हम ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ बनकर खुद को धोखा देते रहते हैं !

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बच्चों में स्मार्टफोन की बढ़ती लत देश ही नहीं, पूरी दुनिया में चिंता का विषय है. यह न सिर्फ बच्चों की आंखें कमजोर कर रहा है, मोटापा बढ़ा रहा है और आलसी बना रहा है बल्कि इसके जरिये उपलब्ध सामग्री भी इतनी हानिकारक है कि ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है और फ्रांस, पुर्तगाल जैसे नौ देश इस पर बैन लगाने की योजना बना रहे हैं. हमारे देश में भी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित कर दिया है तथा गोवा, महाराष्ट्र और बिहार भी ऐसा करने के बारे में सोच रहे हैं. इसके बावजूद मोबाइल के बच्चों पर दुष्प्रभाव की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं, जो दर्शाती हैं कि बच्चों के स्क्रीन टाइम में कमी नहीं आ रही है और मैदानी खेल के बजाय वे मोबाइल से ही चिपके रहते हैं. हालत इतनी खराब है कि दुनिया में जितने बच्चे कुपोषित हैं, उससे ज्यादा मोटापे का शिकार हैं. हमारे देश में तो एक रिपोर्ट के अनुसार तीन में से सिर्फ एक बच्चा ही बिना हांफे दौड़ पाता है.  ऐसे समय में पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले...

असली जीत

जब गाली कोई देता है बदले में चुप रह जाता हूं तब कायर मुझको लोग समझने लगते हैं। पर मुझे पता है गाली मैं भी दे दूंगा तो जीत सामने वाले की हो जायेगी मैं भी उसके जैसा ही कीचड़ में लथपथ हो जाऊंगा इसलिये कभी जब कोई गुस्सा होता है मैं बदले में देकर मीठी मुस्कान आग में पानी डाला करता हूं जो अपने गुस्से की ज्वाला में मुझे जलाने वाला था वह आग बुझाते ही मेरे शर्मिंदा होने लगता है। धुलने लगता जब मैल साफ-सुथरा वह होने लगता है तब मुझको अपनी जीत दिखाई पड़ती है।   (रचनाकाल : 7-8 मार्च 2026)

बहादुरों की अहिंसा के अभाव में तबाह होती दुनिया

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 दुनिया इन दिनों भीषण युद्धों से कराह रही है. रूस-यूक्रेन और इजराइल-फिलिस्तीन के संघर्ष मानो कम थे कि अमेरिका-इजराइल ने ईरान को नेस्तनाबूद करने की ठान ली है. बदले में ईरान भी इजराइल और मिडिल ईस्ट के अमेरिकी ठिकानों पर जबर्दस्त पलटवार कर रहा है, जिससे यूरोपीय देशों के लिए अमेरिका का साथ देना मजबूरी बन गई है. इधर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच संघर्ष भी तेज हो गया है.  यह सच है कि दुनिया में युद्ध प्राचीन काल से ही होते रहे हैं. इतिहास के पन्ने युद्धों में शूरवीरता दिखाने वाले नायकों के महिमा-मंडन से भरे पड़े हैं. हालांकि अहिंसा का प्रतिपादन करने वाले बुद्ध और महावीर जैसे महामानव भी आज से ढाई हजार साल पहले ही हो चुके हैं, इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि मानव जाति को अहिंसा के महत्व की पूरी जानकारी ही नहीं थी, लेकिन अहिंसा के इन पुरोधाओं को भगवान मान कर पूजने के बावजूद हमने उनके सपनों के अहिंसक समाज के निर्माण में कितनी प्रगति की है? लगभग एक सदी पूर्व महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के जरिये व्यावहारिक जीवन में अहिंसा के कार्यान्वयन की कुछ हद तक सफल कोशिश की थी लेकिन वह सत्ता पक्ष के खि...

जंगबाजों के प्रति

निर्दोष हमारी होली थी फूलों का रंग लगाकर हम त्यौहार मनाया करते थे तुमने क्यों लहू मिला डाला दुनिया में कैसा खूनी खेल रचा डाला! त्यौहार मनाने की खातिर  दीवाली में हम फोड़ा करते नकली बम तुमने तो एटम बम से महाविनाश किया आतंक मचाया इतना अधिक गोलियों से बंदूक खिलौने वाली में भी असली बंदूकों जैसा डर थोप दिया! हम तो भाईचारा फैलाने वाले हैं दुश्मन को भी होली पर गले लगाते हैं तुम क्यों गुलाल को लहूलुहान बनाते हो पावन त्यौहारों पर क्यों दाग लगाते हो! रचनाकाल : 2-3 मार्च 2026

गाँव की शवयात्रा

मैं चिंतित था दुनिया जहान के प्रति और अपने प्रति भी. ट्रेन के इंतजार में खचाखच भरी भीड़ देख व्याकुुल हो जाता था यह सोच कि जो जवान हैं- घेर लेंगे सारी सीटें कैसे सफर कर पायेंगी बच्चों को गोद लिए महिलाएँ! करता था इरादा कि नहीं शामिल होऊँगा सीटों की अंधी दौड़ में खड़-खड़ करूँगा सफर. पर सुनाई देते ही ट्रेन के आने की सीटी अज्ञात आशंका के वशीभूत हो बदलने लगता था निर्णय धीमी होते ही ट्रेन दौड़ पड़ता था सीट पाने यह सोच कर कि दिखते ही कोई जरूरतमंद छोड़ दूँगा जगह. पर बारी आई जब सीट देने की पाया मैंने आसपास अपने ही जैसे जवानों को वह, जिसे सर्वाधिक जरूरत थी खचाखच भरी ट्रेन में मुझ तक पहुँच पाने में असमर्थ थी. इसी तरह देख कर समाज में भीषण असमानता निश्चय किया था कभी कि नहीं करूँगा नौकरी पर आया समय जब परिवार चलाने का घेर लिया ऐसी ही आशंका ने. समझाया था अपने मन को कि मूकदर्शक बनने की अपेक्षा कर पाऊँगा कुछ मदद भीषण अभावग्रस्तों की तो ज्यादा होगा सार्थक. कभी नहीं कर पाया पर किसी अभावग्रस्त की मदद एक हाथ से कमाकर दूसरे हाथ से चढ़ाता रहा भेंट शहर की महँगाई को कभी नहीं उबर पाया अपनी जरूरतों से देखते ही रहे...

सृष्टा

फिर से पहुँच गया हूँ गाँव जहाँ बिखरे पड़े हैं मेरी कविता-कहानियों के पात्र. आसान होता है शहर में बैठ कर गाँव की बातें लिखना यहाँ तो कौन सा पात्र कब आकर झाँकने लगे पीछे से पता नहीं. पात्रों को कठपुतली बनाना मुझे पसंद नहीं पर यहाँ तो वे इतने सशक्त हैं कि पसीना छूट जाता है मुझे उनके बारे में लिखने में अन्याय या अनदेखी होते ही रुष्ट हो जाते हैं वे देखते हैं उलाहने से एक पर दृष्टि केंद्रित करो तो दूसरा छूटने लगता है और दूसरे पर नजर साधो तो तीसरा. कमी नहीं है यहाँ पात्रों की वरन मुश्किल होता है चुनाव जिसे छोड़ो वही नाराज हो जाता है. कुछ भी करने को तैयार हैं वे अपने आपको बदलने को भी शर्त सिर्फ यही है कि न हो अनदेखी ली जाय दखल. अब समझ में आता है कि सृष्टा बनना कितना कठिन होता है.

रेगिस्तान की यात्रा

खुश था इन दिनों अच्छी बन रही थीं कविताएँ सार्थक बीत रहे थे दिन कड़कड़ाती ठण्ड में भी उठ आता था भोर में नियत समय पर. मजा आने लगा था परेशानियों को झेलने में आसान हो गई थी जिंदगी दु:ख के आवरण में छिपा मिलने लगा था सुख. पर वह अंत नहीं था जीवन का अब जाना, कि रास्ते में मोड़ भी हैं सूखने लगा है जीवन रस और बिना पानी के पार करना है रेगिस्तान. ऐसा नहीं कि असम्भव है यह इस रास्ते पर भी मिल ही जाते हैं कुछ पदचिह्न पर ढल गए हैं जिस रूप में वे मंजूर नहीं वह बनना मुझे. जानता हूँ कि हमेशा से- ऐसा नहीं रहा होगा कैक्टस कि रेगिस्तान की यात्रा में बचाए रखने को जीवनरस परिस्थितियों ने उसे बना दिया होगा काँटेदार. इसी तरह अन्य जीव-जंतुओं ने भी बाहर से ओढ़ ली होगी कठोरता ताकि भीतर बचा रह सके जीने लायक पानी. पर मैं नहीं बनना चाहता काँटेदार परिस्थितियों में ढल कर नहीं चाहता खुद को बचाना इसीलिए रेगिस्तान में खोद रहा हूँ कुआँ. जानता हूँ कि रास्ता लम्बा है और नहीं मिला अगर पानी तो मौत निश्चित है पर यह भी मालूम है कि दम टूटने के पहले लग सका अगर कुएँ में पानी तो होगी वह रेगिस्तान के खत्म होने की शुरुआत कि गुजरेगी जब ...