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उन्नति क्या इसको कहते हैं?

अनुभव से जब सीखा करता चीज नई खुश होता हूं, पर पछतावा भी होता है पहले ही सीख लिया होता तो इतने दिन इस सुविधा से वंचित न रहा आया होता! पर याद आता प्राचीनकाल जब छोटी-छोटी चीज सीखने में भी कितनी ही सदियां लग जाती थीं जो आग सुलभ है आज जरा सी तीली में क्या नहीं हजारों साल लगे थे उस पर काबू पाने में! पहिये ने की आसान जिंदगी बहुत, मगर होने में उसे परिष्कृत जाने कितनी सदी लगी होगी! हम आज बहुत ही विकसित हैं पर इसकी खातिर कर्जदार पुरखों के हैं जैसे दूने से चार गुना, फिर आठ गुना हो जाता है उन्नति भी हम इस तरह गुणात्मक करते हैं जब संख्या छोटी होती है तब नहीं गुणनफल उसका ज्यादा होता है पुरखों ने किया विकास शून्य के पहले से इसलिये हजारों साल लगे उनको जीरो तक आने में हमको इतनी समृद्ध विरासत मिली कि द्विगुणित कुछ वर्षों में ही सबकुछ हो जाता है जीवन आसान निरंतर होता जाता है। संघर्षों में लेकिन जो बीता करता था कैसे हम अब वह समय बिताया करते हैं! क्या सुविधाभोगी जीवन बन जाने को ही सचमुच में उन्नति कहते हैं? रचनाकाल : 15-18 जनवरी 2026

संक्रांति-बेला

जब रात देवताओं की ढलने लगती है जब प्रकृति शीतनिद्रा से जागा करती है जब सूर्य उत्तरायण होने लग जाते हैं तब हम हर साल मकर संक्रांति मनाते हैं। हम इंसानों की रात मगर कब बीतेगी कब मानवता का सूर्य उत्तरायण होगा कब छोड़ तामसिक निशाचरों जैसा जीवन यम-नियम पालकर सीखेंगे हम अनुशासन? संक्रांति-काल में यही मांगता ईश्वर से हम इनसानों को मुफ्त कभी कुछ मत देना देना ही चाहो यदि कुछ तो अपने जैसा बन पाने की क्षमता देना ! रचनाकाल : 14 जनवरी 2026

जब असभ्यता ही बन जाए शिष्टाचार तो क्या कीजे !

 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में हाल ही में एक स्तब्ध कर देने वाला वाकया हुआ. वहां आयोजित एक राष्ट्रीय परिसंवाद में कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल ने अपने हल्के-फुल्के और चुटकुलों से भरे (जाहिर है विषय से परे) वक्तव्य के दौरान जब सामने बैठे आमंत्रित साहित्यकार मनोज रूपड़ा से अनायास ही पूछा कि ‘आप बोर तो नहीं हो रहे!’ तो रूपड़ा ने सहज ही कह दिया कि ‘आप विषय पर बात कीजिए.’ इस जवाब से कुलपति इतने कुपित हुए कि रूपड़ा को अपमानित करते हुए कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें दोबारा किसी कार्यक्रम में न बुलाया जाए.  अब चर्चा जितनी कुलपति की अभद्रता की हो रही है, उतनी ही वहां मंच पर तथा हाॅल में मौजूद साहित्यकारों व अन्य प्रतिष्ठित जनों की चुप्पी की भी. कहा जा रहा है कि वहां मौजूद लोग अगर इस उजड्डता को खामोशी से सह नहीं लेते तो कुलपति महोदय को माफी मांगने के लिए मजबूर किया जा सकता था. इसमें कोई शक नहीं कि कुलपति की प्रतिक्रिया बहुत ही निम्नस्तरीय थी लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि यह कोई पूर्वनियोजित नहीं थी. कुलप...

भोग से त्याग की ओर

तुम जितना ही सुख-सुविधाओं में जीते हो मैं स्वेच्छा से उतनी तकलीफें सहता हूं तुम धरती के संसाधन करते खत्म लगाकर पेड़ उसे समृद्ध बनाने की कोशिश मैं करता हूं। यह सच है मेरी शक्ति बहुत है अल्प तुम्हारी तुलना में पहुंचाते तुम जितना ज्यादा नुकसान बहुत ही कम उसकी भरपाई मैं कर पाता हूं पर तेज हवा में भी चिनगारी बुझे नहीं इसकी खातिर ही पूरा जोर लगाता हूं मन में है दृढ़ विश्वास, कभी तो ऐसा भी दिन आएगा चिनगारी मेरी दावानल बन जाएगी जो लगती अभी खिलाफ, हवा वह ही उसको फैलाएगी तुम राह भोग की छोड़, त्याग को जीवन में अपनाओगे सब जीव चराचर नहीं बने हैं हम इनसानों की खातिर हम मानव ही सबकी खातिर हैं बने कभी यह सत्य समझ तो पाओगे! (रचनाकाल : 17 जून 2025)

नारी तू कमजोर नहीं, क्यों पुरुषों जैसा बनती है ?

 हाल ही में नववर्ष की पूर्व संध्या पर होने वाली पार्टियों में बड़ी संख्या में महिलाएं, खासकर जेन-जी लड़कियां शराब के नशे में धुत नजर आईं, जिससे सवाल उठ रहा है कि क्या महिलाएं इस मामले में भी पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं? यह सवाल इसलिए भी ज्यादा परेशान करने वाला है कि महिलाओं में नशा करने का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है, 2019-21 में भारतीय महिलाओं में जहां शराब पीने की दर 0.7 प्रतिशत थी, वहीं अब यह 1.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है, यानी लगभग दोगुना! हाल ही में जर्मनी में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं पर शराब का बुरा असर पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा पड़ता है. शोधकर्ताओं ने पुरुषों और महिलाओं को वजन के अनुपात में समान मात्रा में शराब दी. पता चला कि महिलाओं के शरीर में शराब को शुरुआती चरण में तोड़ने वाला एंजाइम कम सक्रिय रहा, जिससे ज्यादा अल्कोहल सीधे खून में पहुंच गया और इसके चलते नशा तेजी से बढ़ा. एक अध्ययन में तो यह भी पाया गया है कि महिलाओं के हार्मोनल चक्र न केवल उन्हें नशीली दवाओं की लत के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं बल्कि नशे की लत छुड़ाने वाली उन दवाओं का भी उन ...

उम्मीद बांधते साल

मैं नये साल से उम्मीदें हर बार लगाया करता था कुछ चमत्कार हो जायेगा सबकुछ अपने ही आप ठीक हो जायेगा जाने क्यों ऐसा लगता था। पर स्तब्ध रह गया जब जाना यह सच्चाई हर साल नया उम्मीदें मुझसे रखता है कुछ चमत्कार कर जाऊंगा अपने अच्छे-अच्छे कामों से नये साल का नाम अमर कर जाऊंगा इस इंतजार में रहता है! तब से स्वागत कर नये साल का आश्वासन यह देता हूं होने दूंगा न निराश उसे लगने दूंगा न कलंक कोई कुछ काम करूंगा ऐसा जिससे याद रखेगी दुनिया उसको यह कहकर वह साल बहुत ही अद्‌भुत था! रचनाकाल : 30 दिसंबर 2025

नए साल की नई भोर क्यों अलसाई-सी लगती है ?

 नववर्ष की पूर्वसंध्या नजदीक आ गई है. चंद घंटों बाद ही नया साल दस्तक दे देगा, जिसके स्वागत की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं. होटल, पब, रेस्तरां- सब बुक हो चुके हैं और आधी रात को बारह बजते ही सेलिब्रेशन का सैलाब उमड़ पड़ेगा. लेकिन ‘नए साल की नई सुबह’ का क्या होगा? कितने लोग मुंह-अंधेरे उठकर उगते सूरज को देख पाएंगे?  हाल ही में बेंगलुरु में एमडी ड्रग्स की तीन फैक्ट्रियां पकड़े जाने की खबर सामने आई और 55 करोड़ रुपए का ड्रग्स बरामद किया गया. इसके एक दिन पहले 26 दिसंबर को मुंबई में 35 करोड़ की ड्रग्स पकड़े जाने की खबर थी. यह शोध का विषय हो सकता है कि नववर्ष की पूर्वसंध्या पर हम में से अधिकांश लोग किस तरह से नए साल के आगमन का जश्न मनाते हैं, लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि शराब की बिक्री इस अवसर पर अन्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है. आज के उपभोक्तावादी युग में उत्सव का अर्थ हम भले ही मौज-मस्ती समझते हों, लेकिन हमारे पूर्वजों की नजर में ये खुद को निर्मल और पवित्र बनाने के अवसर होते थे. भारतीय संस्कृति में व्रत-उपवास का अनन्य महत्व है और प्रकृति से सामंजस्य बिठाकर जीवन जीने को प्र...